स्वामी विवेकानंद का दिमाग कैसे था इतना तेज़।





किताबें पढ़ना हम सब को अच्छा लगता है। किताबों के माध्यम से हम दूसरे की ज़िन्दगी को जी के देखते है। किताबें हमें दूसरी दुनिया में ले जाती है। किताबे हमारे दिमाग के लिए बहुत ही जरूरी है ये हमारे दिमाग की exercise करने जैसा है। एक अच्छी किताब पढ़ने में हमें बहुत सा समय लग जाता है और ये  लगना भी चहिये। क्योंकि हम अपने पढ़ने की speed को बहुत ज्यादा नहीं बड़ा सकते। 

पर आपको कैसा लगेगा ये जानकर की हमारे भारत के धर्म गुरु जिन्हे हम सब स्वामी विवेकानंद के नाम से जानते है।स्वामी विवेकानंद को किताबें पढ़ने का बहुत शोंक था और  वो एक घण्टे में ही मोटी से मोटी किताब पढ़ लेते थे। 


स्वामी विवेकानंद हिन्दू धर्म का प्रचार करने के लिए देश - विदेश घुमा करते थे। वो जहां भी जाया करते सबसे पहले वहां  की लाइब्रेरी जरूर जाया करते थे। जिससे उनको वहां की संस्कृति और उनके देश के बारे को जानने का मौका मिल जाता था। ऐसे ही वह एक बार अपने साथी के साथ विदेश गए थे। उन्होंने वहां की लाइब्रेरी का पता किया और अपने साथी से रोज़ एक किताब मंगबाने लगे। वह रोज़ एक किताब मंगबाते और उसे एक ही दिन में पढ़ डालते और रोज़ एक नई किताब लाने को बोलते। उस लाइब्रेरी का लाइब्रेरियन ये देखकर बहुत परेशान हुआ और विवेकानंद जी के साथी से पूछने लगा कि "आपको यदि किताबे देखनी है तो मई आपको यही दिखा देता हूँ यूँ आप अपना समय क्यों बर्बाद करते है। और आपको इन किताबो कको ले जाने में इतनी परेशानी उठानी पड़ती है"।उनकी इस बात को सुन कर विवेकानंद जी का साथी बोला "नहीं श्री मान मेरे साथी इन किताबो को पूरा पढते है और इनको पूरा पढ़ने के बाद ही आपको देते है"।  उस लाइब्रेरियन ने कहा " अगर ऐसा है ,तो मै आपके साथी से जरूर मिलना चाहूंगा"। जब स्वामी विवेकानंद जी उस लाइब्रेरियन से मिले तो उसने उनकी परीक्षा लेनी चाही कि कहीं ये मुझसे झूठ तो नहीं बोल रहे। वह उनसे किताबो से जुड़े हुए प्रश्न पूछने लगा परन्तु स्वामी विवेकानंद जी को साडी किताबें एक - एक पेज और लाइन के नंबर के साथ याद थी। ये सब देखकर लाइब्रेरियन भोचक्का रह गया। 


ऐसे ही स्वामी विवेकानंद जी धर्म प्रचार के लिए जर्मनी गए हुए थे। तो वो एक रात के लिए एक जर्मन phylospher के यहाँ रुके हुए थे। वह उससे धर्म और कई अन्य विषयो पर बात कर रहे थे। जैसा की मैने आपको बताया की वह किताबें पढ़ने के शौकीन तो थे ही तो उन्होंने उस phylospher के पास रखी हुयी एक किताब देखी। और उसे पढ़ने के लिए पूछा । वह जर्मन phylospher बोला कि " मै खुद इसे कई दिनों से पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ ,पर ये किताब बहुत जटिल है इसे समझना बहुत ही कठिन है"। स्वामी  विवेकानंद जी ने किताब अपने दोनों हाथों में ली और आंखे बंद करके ध्यान में चले गए और 1 घण्टे के बाद उन्होंने अपनी आंखे खोली और बोलने लगे कि " ये किताब कुछ खास नहीं है ,इसमें कुछ भी पढ़ने जैसा नहीं है।  जब phylopsher  ये सुना तो वह बोलने लगा कि " ये तो घमंड की हद हो गयी अपने किताब को पढ़ा भी नहीं और आप इसके बारे में कैसे टिपण्णी कर सकते है"। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा श्री मान मुझे इस किताब का एक - एक शब्द याद है आप चाहे तो पूछ सकते है"। वह phyloshpher वस् पेज का नंबर बोलता था और स्वामी विवेकानंद पूरा पेज विल्कुल सही सुना देते थे। और कहीं भी एक अक्षर आगे - पीछे नहीं होता था। इस सब से उन्हने उस phylospher को गहरी सोच में डाल दिया था। 

तो क्या था  विवेकानंद जी के तेज़ दिमाग का राज़ ?
नीचे आप जानेंगे स्वामी जी की कुछ ख़ास बातें जिनसे आप अंदाजा लगा सकते है कि स्वामी जी का दिमाग कैसे इतना तेज़ था। 

स्वामी जी करते थे घंटो ध्यान :

स्वामी जी एक योगी थे। और इसी के चलते उन्हें meditation या ध्यान करना अच्छा लगता था उन्हें ध्यान के माध्यम से खुद को जानने का मौका मिल जाता था। वह कई - कई घण्टो ध्यान करा करते थे।  जिससे उनका दिमाग बहुत ही शांत और नए विचारों के लिए खुला रहता था। आप ये शांति उनके चेहरे और उनके चरित्र में भी देख सकते थे। 


थे अखण्ड ब्रह्मचारी :

जैसे कि स्वामी जी एक योगी थे ,और वह पूर्ण ब्रह्मचारी थे वह 39 वर्ष तक जीए और उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। 
एक बार एक विदेशी औरत ने उनके चेहरे का तेज़ ,उनका गठीला शरीर और उनका चरित्र देखकर कहा ,"कि में आपका चरित्र देखकर बहुत आकर्षित हुयी ,और मैं आपके जैसे ही एक तेज़बान पुत्र चाहती हूँ। और ये तभी संभब है जब आप मुझसे विवाह कर लें"। 
स्वामी जी ने जवाब दिया कि हे माता यदि तुम मेरे जैसा पुत्र चाहती हो तो उसके लिए आपको शादी करने की क्या जरूरत है ,मै ही आपका पुत्र बन जाता हूँ। स्वामी जी की इन बातो और चरित्र को देखकर उस औरत की आँखों में आंसू आ गए। दोस्तों स्वामी जी अखंड ब्रह्मचारी रहे। दोस्तों एक व्यक्ति जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है उसका दिमाग बहुत ही तेज़ और ज्यादा ज्ञान को समझने बाला हो जाता है ,उसे किसी बात को समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा भोज नहीं डालना पड़ता। और वह कठिन से कठिन बातों को बड़ी ही आसानी से समझ जाता है। एक ब्रह्मचारी के पास इतना समय ही नहीं होता है कि फालतू  के कामो में बर्बाद करे वह उसे अपने जीवन पर खर्च करता है। 

सार ( conclusion ) :

स्वामी विवेकानंद एक तपस्वी योगी थे। वह कई घंटो ध्यान करा करते थे। और वह अखंड ब्रह्मचारी थे जिससे उनका दिमाग बहुत ही तेज़ था और बाह कठिन से कहतीं चीज़ों को एक बार में ही बड़े आराम से समझ जाते थे। वह काफी ज्यादा समझदार भी थे और अपने दिमाग को नए विचारों के लिए खुला रखते थे। वह जब भी किताब पढ़ने बैठते तो पूरा ध्यान सिर्फ किताब में ही रखते थे। इसी कारण वह मुश्किल से मुश्किल किताब एक बार में बड़ी आसानी से समझ जाते थे और उसे याद भी कर पाते थे। 

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